मेंटल हेल्थ– मुझे मोबाइल की लत है:5 मिनट भी फोकस नहीं कर पाती, कहीं ये ADHD तो नहीं, क्या दवा से मदद मिलेगी?

सवाल– मेरी उम्र 23 साल है और मैं एक मीडिया कंपनी में डेटा एनालिस्ट हूं। मुझे जॉब करते हुए अभी छह महीने ही हुए हैं। मेरी प्रॉब्लम बहुत अजीब सी है। मैं हर वक्त anxious फील करती हूं। किसी भी एक जगह पर या एक काम में ज्यादा देर तक फोकस नहीं कर पाती। जॉब भी एक्साइटिंग नहीं लग रहा है। मैंने एक पॉडकास्ट में सुना कि अटेंशन डेफिसिट पूरी Gen-Z की प्रॉब्लम है। मोबाइल फोन बहुत ज्यादा यूज करने की वजह से ये हो रहा है। ये सुनकर मुझे लगा कि मैं भी तो यही करती हूं। घर जाने के बाद दो-तीन घंटे सिर्फ अपना मोबाइल स्क्रॉल करती रहती हूं। एक रील, दो रील कब 50-100 रील हो जाती हैं, पता ही नहीं चलता। दो दिन इंस्टा पर कुछ पोस्ट न करूं तो फोमो होने लगता है। सुबह भी फ्रेश फील नहीं होता, हर समय थकी रहती हूं। क्या किसी दवा से मदद मिल सकती है। मैं क्या करूं? एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर। समस्या का सार आपका अनुभव दरअसल DADS (डिजिटल इरा अटेंशन डेफिसिट सिंड्रोम) से मेल खाता है। यह समस्या फोकस की कमी और नींद न आने से जुड़ी हुई है। इसका संबंध बहुत ज्यादा डिजिटल कंजम्पशन से है। लगातार स्क्रीन देखते रहने और ऑनलाइन कंटेंट कंज्यूम करने के कारण नर्वस सिस्टम हमेशा उत्तेजित रहता है, जिसके कारण यह समस्या पैदा होती है। जबकि ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) बचपन से शुरू होने वाला एक न्यूरोडेवलपमेंटल इश्यू है। यदि किसी को बचपन में फोकस की समस्या नहीं थी, हाइपरएक्टिविटी नहीं थी और सिर्फ एडल्ट होने के बाद ये समस्याएं हो रही हैं तो यहां डिजिटल ओवरलोड की संभावना ज्यादा है। डिजिटल अटेंशन डेफिसिट के खतरे जब कोई हर वक्त स्क्रीन देखता रहता है और नई–नई सूचनाएं लेता रहता है तो इससे मस्तिष्क के डोपामिन रिवॉर्ड सर्किट बहुत ज्यादा एक्टिव हो जाते हैं। हर थोड़ी देर पर उत्तेजित करने वाली कोई नई सूचना मिलती है और फिर डोपामिन रिलीज होता है। इसका प्रभाव तीन स्तरों पर दिखता है: मानसिक स्वास्थ्य पर असर: इसका पहला असर मेंटल हेल्थ पर पड़ता है और मुख्यत: ये लक्षण दिखते हैं– रिश्तों पर असर: डिजिटल ओवरलोड का असर रिश्तों पर भी पड़ता है। जैसेकि– काम पर असर: डिजिटल ओवरलोड का असर हमारे वर्क परफॉर्मेंस और काम पर भी पड़ता है। जैसेकि– कुल मिलाकर डिजिटल ओवरलोड को ऐसे समझना चाहिए कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो यह आत्म-सम्मान और मोटिवेशन को भी नेगेटिव ढंग से प्रभावित करती है। यह सिर्फ ‘आदत’ का मसला नहीं है। यह एक मेंटल हेल्थ रिस्क है, जो लंबे समय में डिप्रेशन का कारण बन सकता है। ADHD और डिजिटल ओवरलोड में क्या फर्क है? जो समस्याएं डिजिटल ओवरलोड के कारण पैदा हो रही हैं, उसे अक्सर लोग ADHD (अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर) से जोड़कर देखने लगते हैं। लेकिन यह डाइग्नोसिस सही नहीं है। समस्या की सही पड़ताल करने के लिए दोनों के फर्क को समझना जरूरी है। नीचे ग्राफिक में देखिए कि ADHD और डिजिटल ओवरलोड में क्या अंतर है। अपनी समस्या को पहचानें करें सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में कुल 13 सवाल हैं। इनमें से कुछ ADHD का संकेत हैं और कुछ डिजिटल ओवरलोड का संकेत हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल का आपका जवाब अगर ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग रोज’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें। नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। ADHD क्लस्टर से जुड़े सवालों में अगर आपका स्कोर 5 से ज्यादा है तो ADHD की संभावना हो सकती है। ऐसे में एक्सपर्ट से जांच कराना जरूरी है। वैसे ही अगर डिजिटल क्लस्टर के सवालों में आपका स्कोर 5 से ज्यादा है, लेकिन ADHD क्लस्टर के सवालों में 4 से कम है तो आपकी समस्या डिजिटल अटेंशन डेफिसिट की है। ऐसे में स्क्रीन टाइम को कम करने से मदद मिलेगी। बाकी डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें और अपना स्कोर एनालिसिस करें। 4 सप्ताह का सेल्फ हेल्प प्लान सप्ताह 1 सजग होना और नींद लेना सप्ताह 2 डिजिटल बाउंड्री बनाना सप्ताह 3 फोकस री-ट्रेनिंग सप्ताह 4 रीवैल्यूएशन (पुनर्मूल्यांकन) कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) की मदद डिजिटल ओवरलोड का एक कारण हमारा दिमाग और सोचने का तरीका भी है। इसे बदलने में कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) मददगार हो सकती है। जैसेकि नीचे कुछ उदाहरण देखिए– स्थिति: “मैं हर 5 मिनट में फोन देखती हूं।” ऑटोमैटिक विचार: “अगर फोन देखना मिस किया तो सब आगे निकल जाएंगे, मैं पीछे छूट जाऊंगी। ” ऑल्टरनेटिव विचार: “अगर एक घंटा काम पर फोकस कर लूं तो काम जल्दी पूरा हो जाएगा और फिर सच में फ्री टाइम मिलेगा।” एक्शन: फोन दूसरे कमरे में रख दें, टाइमर लगाएं, 1 घंटे बाद देखें। एक्सपर्ट की मदद कब लेनी चाहिए? अगर आपकी समस्या डिजिटल ओवरलोड की है तो माइंडफुलनेस का अभ्यास करने और स्क्रीन टाइम करने से यह समस्या दूर हो सकती है। लेकिन फिर भी कुछ स्थितियों में एक्सपर्ट हेल्प की जरूरत पड़ सकती है। डिटेल नीचे ग्राफिक में देखें– निष्कर्ष आपकी समस्या कोई बीमारी नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि दिमाग पर उसकी क्षमता से ज्यादा बोझ पड़ रहा है। जब भी फोकस में समस्या हो तो समझ जाएं कि दिमाग आपसे कह रहा है– “मैं थका हुआ हूं। मुझे आराम की जरूरत है।” बस आपको थोड़ा आराम करना है, स्क्रीन से दूर रहना है, पूरी नींद लेनी है और माइंडफुलनेस का अभ्यास करना है। इससे आपकी प्रॉब्लम अपने आप दूर हो जाएगी। याद रखें, ध्यान यानी फोकस करने की हमारे मस्तिष्क की क्षमता हमारी सबसे कीमती पूंजी है। इसे संभालकर रखना जरूरी है। इसे यूं ही खर्च न करें। ………………
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आपने अपनी कंडीशन के बारे में जो लिखा है, उससे समझ में आता है कि ये डिप्रेशन नहीं, बल्कि एक एडजस्टमेंट डिसऑर्डर है। जीवन में एक बड़ा बदलाव हुआ है, जिसे स्वीकार करने और उसके साथ तालमेल बिठाने में दिक्कत पेश आ रही है। आगे पढ़िए…
Source: Health

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